होडोपैथी

Rajeev Singh documents traditional plant knowledge with Adivasi knowledge holders at a native plant nursery in Jharkhand.

होडोपैथी: जहाँ आदिवासी ज्ञान जिम्मेदार आधुनिक अनुसंधान से मिलता है

प्राकृतिक कल्याण के लिए स्थानीय वनस्पति ज्ञान का संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन

होडोपैथी एक प्रकृति-आधारित कल्याण पहल है, जिसकी जड़ें आदिवासी समुदायों, पारंपरिक ज्ञानधारकों और वनों पर आश्रित परिवारों द्वारा सदियों से संरक्षित ज्ञान में हैं।

यह पहल स्थानीय वनस्पतियों, ऋतु-अनुकूल खाद्य पदार्थों, पारंपरिक पोषण और प्रकृति के अनुरूप जीवन-पद्धतियों से जुड़ी उनकी समझ से प्रेरणा ग्रहण करती है। होडोपैथी का उद्देश्य इस बहुमूल्य विरासत को सम्मानपूर्वक संरक्षित करना, जिम्मेदारी के साथ उसका प्रलेखन करना तथा उपयुक्त पारंपरिक ज्ञान को वानस्पतिक, पोषण एवं वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ना है।

इसका व्यापक लक्ष्य पारंपरिक ज्ञान से जिम्मेदारीपूर्वक विकसित प्राकृतिक पोषण अनुपूरकों और आधुनिक कल्याण समाधानों तक पहुँचने के लिए एक विश्वसनीय, पारदर्शी एवं अनुसंधान-आधारित मार्ग विकसित करना है।

होडोपैथी का उद्देश्य

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों और पारंपरिक अभ्यासकर्ताओं ने जंगलों, खेतों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ पीढ़ियों से चले आ रहे संबंधों के माध्यम से बहुमूल्य व्यावहारिक ज्ञान विकसित किया है।

इस ज्ञान में निम्न विषय सम्मिलित हो सकते हैं:

  • स्थानीय एवं उपयोगी वनस्पतियों की पहचान
  • पारंपरिक खाद्य पदार्थ और ऋतु-अनुकूल पोषण
  • पौधों के संग्रहण और खेती की स्थानीय पद्धतियाँ
  • तैयारी, सुखाने और संरक्षण की पारंपरिक विधियाँ
  • संतुलित एवं प्रकृति-अनुकूल जीवन के सामुदायिक दृष्टिकोण
  • जंगलों, स्थानीय वनस्पतियों और जैव-विविधता का संरक्षण

इस ज्ञान का बड़ा भाग औपचारिक दस्तावेजों के बजाय मौखिक शिक्षा और व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता रहा है।

बदलती जीवन-शैली, प्राकृतिक आवासों पर बढ़ता दबाव और अनुभवी ज्ञानधारकों की बढ़ती आयु के कारण कई मूल्यवान परंपराओं के धीरे-धीरे लुप्त होने का खतरा है।

होडोपैथी इस जीवंत विरासत को समाप्त होने से पहले सम्मानपूर्वक संरक्षित करने का प्रयास है।

श्री राजीव सिंह का संदेश

“होडोपैथी विरासत में मिले प्राकृतिक ज्ञान और जिम्मेदार आधुनिक अनुसंधान के बीच एक सेतु है। हमारा उद्देश्य आदिवासी समुदायों और पारंपरिक ज्ञानधारकों की जीवन-बुद्धि को संरक्षित करना तथा यह सुनिश्चित करना है कि प्रकृति और इस ज्ञान के मूल संरक्षकों को वह पहचान और सम्मान मिले जिसके वे अधिकारी हैं।”

राजीव सिंह
होडोपैथी के प्रवर्तक एवं पुनरुत्थानकर्ता

झारखंड के मूल निवासी श्री राजीव सिंह पर्यावरणविद्, कृषि-उद्यमी और प्राकृतिक खेती के समर्थक हैं। वनस्पतियों, किसानों, पर्यावरण और जनजातीय समुदायों के साथ उनके कार्य ने होडोपैथी के पुनरुत्थान और इसे एक विश्वसनीय प्राकृतिक-कल्याण मंच के रूप में विकसित करने के प्रयासों को दिशा दी है।

उनकी भूमिका होडोपैथी पर स्वामित्व का दावा करना नहीं, बल्कि इसके वास्तविक ज्ञानधारकों को पहचान दिलाना तथा समुदायों, शोधकर्ताओं और जिम्मेदार संस्थानों के बीच सहयोग स्थापित करना है।

Rajeev Singh explores native plants with Adivasi elders and a field researcher during a Hodopathy initiative in Jharkhand.
Rajeev Singh collaborates with Adivasi knowledge holders and a field researcher to study native plants and preserve Jharkhand’s traditional ecological knowledge through Hodopathy.

होडोपैथी का मूल दर्शन

होडोपैथी एक बुनियादी सिद्धांत का अनुसरण करती है:

पारंपरिक ज्ञान का सम्मान करें वैज्ञानिक रूप से उसका मूल्यांकन करें और जिम्मेदारीपूर्वक संवाद करें।

पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिक अनुसंधान को महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान कर सकता है। लेकिन केवल पारंपरिक उपयोग किसी प्राकृतिक घटक को स्वतः सुरक्षित, प्रभावी अथवा प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयुक्त सिद्ध नहीं करता।

इसलिए होडोपैथी प्रत्येक पारंपरिक व्यवहार को बिना मूल्यांकन स्वीकार या प्रचारित नहीं करती। इसका उद्देश्य संबंधित ज्ञान के सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संदर्भ को समझना, प्राकृतिक घटकों की सही पहचान करना तथा उपयुक्त वानस्पतिक, पोषण, गुणवत्ता और सुरक्षा मूल्यांकन को प्रोत्साहित करना है।

होडोपैथी का दर्शन चार आधारों पर निर्मित है:

पारंपरिक ज्ञान

आदिवासी समुदायों, बुजुर्गों और अनुभवी पारंपरिक ज्ञानधारकों के जीवन-अनुभव एवं योगदान का सम्मान।

प्राकृतिक संसाधन

जंगलों, जैव-विविधता, स्थानीय वनस्पतियों, मिट्टी और जल-संसाधनों की रक्षा।

जिम्मेदार अनुसंधान

पारंपरिक ज्ञान को वानस्पतिक पहचान, पोषण विज्ञान, गुणवत्ता परीक्षण और सुरक्षा मूल्यांकन से जोड़ना।

सामुदायिक मान्यता

उन व्यक्तियों और समुदायों को उचित पहचान, भागीदारी और लाभ प्रदान करना जिन्होंने इस ज्ञान को पीढ़ियों से सुरक्षित रखा है।

होडोपैथी की ज्ञान-यात्रा

1. ज्ञानधारकों को सुनना

होडोपैथी की प्रक्रिया पारंपरिक अभ्यासकर्ताओं, आदिवासी बुजुर्गों, किसानों और वनों पर आश्रित समुदायों के साथ संवाद से आरंभ होती है।

पहला चरण उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनना और यह समझना है:

  • इस ज्ञान के वास्तविक धारक कौन हैं
  • उन्हें यह ज्ञान किस व्यक्ति या परंपरा से प्राप्त हुआ
  • इसमें कौन-से पौधे अथवा प्राकृतिक घटक सम्मिलित हैं
  • इनका परंपरागत रूप से संग्रह किस प्रकार किया जाता है
  • इन्हें कैसे तैयार और सुरक्षित रखा जाता है
  • इनसे जुड़ा सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संदर्भ क्या है
  • समुदाय किन सावधानियों और सीमाओं का पालन करता रहा है

पारंपरिक ज्ञान को उन व्यक्तियों, समुदायों, भाषाओं और प्राकृतिक स्थानों से अलग नहीं किया जाना चाहिए जिन्होंने इसे संरक्षित किया है।

2. सम्मानपूर्ण प्रलेखन

होडोपैथी संबंधित ज्ञानधारकों की सहमति और सहभागिता से उपयुक्त पारंपरिक ज्ञान का साक्षात्कार, लिखित अभिलेख, छायाचित्र, क्षेत्रीय अवलोकन और वानस्पतिक रेखाचित्रों के माध्यम से प्रलेखन करना चाहती है।

प्रलेखन में निम्न जानकारी सम्मिलित की जा सकती है:

  • पौधों के स्थानीय और क्षेत्रीय नाम
  • परंपरागत रूप से चुने गए वनस्पति भाग
  • पौधों की उपलब्धता का मौसम और स्थान
  • संग्रहण, तैयारी और भंडारण की विधियाँ
  • पारंपरिक भोजन और पोषण संबंधी उपयोग
  • समुदाय का अनुभव और सांस्कृतिक संदर्भ
  • ज्ञात सावधानियाँ और प्रतिबंध
  • प्राकृतिक आवास और संरक्षण की स्थिति

जिम्मेदार प्रलेखन बहुमूल्य ज्ञान को लुप्त होने से बचा सकता है और आगे के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए एक व्यवस्थित आधार तैयार कर सकता है।

प्रलेखन का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक जानकारी को सार्वजनिक या व्यावसायिक उपयोग के लिए उपलब्ध करा दिया जाए। गोपनीय, पवित्र अथवा समुदाय-विशिष्ट ज्ञान तक पहुँच समुदाय के निर्णय और नियंत्रण में रहनी चाहिए।

3. सटीक वानस्पतिक पहचान

किसी पौधे का एक ही स्थानीय नाम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न प्रजातियों के लिए उपयोग किया जा सकता है। देखने में समान लगने वाले पौधे भी अपनी संरचना, गुणों और सुरक्षा के स्तर में अलग हो सकते हैं।

इसलिए किसी भी अनुसंधान या उत्पाद-विकास से पहले पौधे की सटीक वानस्पतिक पहचान आवश्यक है।

होडोपैथी समुदाय के ज्ञान को योग्य वनस्पति वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और उपयुक्त संस्थानों से जोड़कर निम्न कार्यों को प्रोत्साहित करना चाहती है:

  • पौधों की सही प्रजाति की पुष्टि
  • प्राकृतिक घटकों की प्रामाणिकता का सत्यापन
  • क्षेत्रीय वनस्पति विविधताओं का अध्ययन
  • गलत प्रतिस्थापन और मिलावट से बचाव
  • प्रमाणित वानस्पतिक अभिलेख तैयार करना
  • हर्बेरियम संदर्भ नमूनों का संरक्षण
  • प्राकृतिक सामग्री के स्रोत की पता लगाने योग्य व्यवस्था स्थापित करना

सही पहचान के बिना किसी पौधे को अनुसंधान, पोषण अनुपूरक अथवा कल्याण उत्पाद के विकास के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

4. वैज्ञानिक और पोषण संबंधी मूल्यांकन

सही वानस्पतिक पहचान के बाद चयनित प्राकृतिक घटकों पर उपयुक्त वैज्ञानिक, पोषण और सुरक्षा अनुसंधान किया जा सकता है।

संबंधित घटक और उसके प्रस्तावित उपयोग के आधार पर मूल्यांकन में निम्न विषय सम्मिलित हो सकते हैं:

  • पोषण संरचना
  • प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले रासायनिक घटक
  • शुद्धता और संदूषण के संभावित जोखिम
  • सूक्ष्मजीवी सुरक्षा
  • भारी धातुओं और हानिकारक अवशेषों की जाँच
  • स्थिरता और भंडारण संबंधी आवश्यकताएँ
  • उपयुक्त प्रसंस्करण विधियाँ
  • अन्य प्राकृतिक घटकों के साथ अनुकूलता
  • संभावित जोखिम और ज्ञात सीमाएँ
  • दवाओं के साथ संभावित परस्पर प्रभाव
  • लागू नियामकीय आवश्यकताएँ

पारंपरिक ज्ञान अनुसंधान की दिशा प्रदान करता है। वैज्ञानिक अध्ययन यह मूल्यांकन करने में सहायता करता है कि कोई घटक जिम्मेदार विकास के लिए सुरक्षित, उपयुक्त और व्यावहारिक है या नहीं।

5. पारंपरिक तैयारी-विधियों का संरक्षण

पारंपरिक ज्ञानधारक छाया में सुखाने, पत्थर पर पीसने, पानी में भिगोने, खाद्य पदार्थों के साथ मिलाने और ऋतु के अनुसार सुरक्षित रखने जैसी विभिन्न प्रक्रियाओं का उपयोग कर सकते हैं।

होडोपैथी उपयुक्त पारंपरिक विधियों के पीछे के सिद्धांतों को समझने और यह अध्ययन करने का प्रयास करती है कि उन्हें आधुनिक गुणवत्ता प्रणालियों के साथ जिम्मेदारीपूर्वक किस प्रकार जोड़ा जा सकता है।

उदाहरण के लिए:

  • छाया में सुखाने की परंपरा नियंत्रित कम तापमान वाली प्रसंस्करण विधि को दिशा दे सकती है।
  • ऋतु संबंधी ज्ञान पौधों के संग्रहण का उपयुक्त समय समझने में सहायता कर सकता है।
  • समुदाय द्वारा की जाने वाली पौध पहचान वानस्पतिक प्रमाणीकरण का प्रारंभिक आधार बन सकती है।
  • पारंपरिक खाद्य संयोजन पोषण अनुसंधान को दिशा दे सकते हैं।
  • स्थानीय भंडारण विधियाँ टिकाऊ पैकेजिंग के विकास के लिए प्रेरणा प्रदान कर सकती हैं।

इसका उद्देश्य प्रत्येक परंपरा का व्यावसायीकरण करना नहीं है। केवल उन्हीं प्रथाओं को आगे विकसित किया जाना चाहिए जो उपयुक्त अनुसंधान के बाद सुरक्षित, टिकाऊ, नैतिक और नियामकीय रूप से स्वीकार्य पाई जाएँ।

6. जिम्मेदार उत्पाद-विन्यास

उपयुक्त अनुसंधान, सुरक्षा मूल्यांकन और नियामकीय समीक्षा के बाद चयनित प्राकृतिक घटकों पर आधारित आधुनिक पोषण एवं कल्याण उत्पादों की संभावनाएँ तलाशी जा सकती हैं।

होडोपैथी की उत्पाद-विकास पद्धति निम्न प्राथमिकताओं पर आधारित होगी:

  • सावधानीपूर्वक चयनित प्राकृतिक घटक
  • पारदर्शी और स्पष्ट उत्पाद-संरचना
  • घटकों की उपयुक्त मात्रा और संयोजन
  • आधुनिक स्वच्छता और प्रसंस्करण मानक
  • प्रत्येक बैच की गुणवत्ता में एकरूपता
  • उपयुक्त पैकेजिंग और भंडारण
  • जिम्मेदार उपयोग के स्पष्ट निर्देश
  • वैज्ञानिक प्रमाणों और नियमों के अनुरूप संचार
  • अतिरंजित अथवा अप्रमाणित दावों से परहेज

इसका केंद्र सामान्य पोषण और समग्र कल्याण में सहयोग देना है—बिना वैज्ञानिक प्रमाण के रोगों के उपचार संबंधी दावे करना नहीं।

7. गुणवत्ता और सुरक्षा

किसी प्राकृतिक घटक की उत्पत्ति प्रकृति से होना यह सुनिश्चित नहीं करता कि वह प्रत्येक मात्रा में और प्रत्येक व्यक्ति के लिए सुरक्षित होगा।

इसलिए होडोपैथी निम्न गुणवत्ता एवं सुरक्षा उपायों का समर्थन करती है:

  • कच्ची सामग्री की वानस्पतिक प्रामाणिकता
  • शुद्धता और संदूषण परीक्षण
  • सूक्ष्मजीव और भारी धातु विश्लेषण
  • प्रसंस्करण और स्वच्छता नियंत्रण
  • स्थिरता और उपयोग-अवधि का मूल्यांकन
  • पैकेजिंग गुणवत्ता की जाँच
  • बैच-स्तरीय अभिलेखीकरण और स्रोत-पहचान
  • जिम्मेदार उपभोक्ता जानकारी
  • लागू गुणवत्ता एवं नियामकीय मानकों का पालन

गुणवत्ता, पारदर्शिता और सुरक्षा होडोपैथी की विश्वसनीयता के आवश्यक आधार हैं।

होडोपैथी के केंद्र में आदिवासी ज्ञान

आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से जंगलों और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र के साथ निकट संबंध में रहते आए हैं। पौधों, पारंपरिक खाद्य पदार्थों, ऋतु और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी उनकी समझ भारत की जीवंत सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत का महत्त्वपूर्ण भाग है।

होडोपैथी इस ज्ञान के साथ सम्मान, सहमति, पारदर्शिता और जिम्मेदारी के आधार पर कार्य करना चाहती है।

जहाँ सामुदायिक ज्ञान का योगदान प्रलेखन, अनुसंधान अथवा उत्पाद-विकास में हो, वहाँ होडोपैथी निम्न सिद्धांतों का समर्थन करती है:

  • मूल ज्ञानधारकों और स्रोत समुदायों को उचित पहचान
  • समुदाय की पूर्व-सूचित सहमति और सक्रिय भागीदारी
  • आदिवासी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं का सम्मान
  • नैतिक प्रलेखन और जिम्मेदार संचार
  • सामुदायिक ज्ञान के अनधिकृत उपयोग से सुरक्षा
  • सहयोग, प्रशिक्षण और रोजगार के न्यायपूर्ण अवसर
  • समुदाय-केंद्रित आजीविका विकास
  • लागू जैव-विविधता और लाभ-साझाकरण प्रावधानों का अनुपालन
  • संभावित व्यावसायिक लाभों का निष्पक्ष वितरण

होडोपैथी समुदायों के ज्ञान से केवल आर्थिक मूल्य प्राप्त नहीं करना चाहती। इसका उद्देश्य समुदायों के साथ मिलकर ऐसा साझा मूल्य विकसित करना है जिसमें वे समान भागीदार और लाभार्थी हों।

जंगलों और स्थानीय वनस्पतियों की रक्षा

यदि संबंधित जंगल और वनस्पतियाँ समाप्त हो जाएँ तो उनसे जुड़ा पारंपरिक ज्ञान भी लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता।

अनियंत्रित संग्रहण जैव-विविधता को नुकसान पहुँचा सकता है और स्थानीय समुदायों के लिए उपयोगी पौधों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए होडोपैथी निम्न प्रयासों को प्रोत्साहित करती है:

  • स्थानीय वनस्पति प्रजातियों का संरक्षण
  • टिकाऊ और जिम्मेदार संग्रहण पद्धतियाँ
  • उपयुक्त वनस्पतियों की नियोजित खेती
  • पारदर्शी और स्रोत-पहचान योग्य आपूर्ति
  • मिट्टी, जल और जैव-विविधता की रक्षा
  • संरक्षण गतिविधियों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी
  • पौधों की खेती के माध्यम से आजीविका के अवसर
  • प्राकृतिक जंगलों पर अनावश्यक दबाव में कमी
  • स्थानीय पौधशालाओं और जीवित संग्रहों का विकास
  • क्षतिग्रस्त प्राकृतिक आवासों का पुनर्स्थापन

प्राकृतिक कल्याण की कोई भी पहल पर्यावरणीय स्वास्थ्य को हानि पहुँचाकर आगे नहीं बढ़ सकती। मानव कल्याण और प्रकृति का संरक्षण साथ-साथ चलना चाहिए।

झारखंड: होडोपैथी की यात्रा का आरंभ

झारखंड के जंगल, समृद्ध जैव-विविधता और आदिवासी विरासत इसे वनस्पतियों, भोजन, संस्कृति, पोषण और मानव कल्याण के बीच संबंधों का अध्ययन करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बनाते हैं।

होडोपैथी के पुनरुत्थान को झारखंड से आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके अंतर्गत पारंपरिक अभ्यासकर्ताओं और सामुदायिक ज्ञानधारकों को वनस्पति वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, प्रयोगशालाओं और जिम्मेदार संस्थानों से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।

श्री राजीव सिंह का योगदान इन समूहों के बीच सहयोग स्थापित करने तथा प्रलेखन, अनुसंधान, सामुदायिक भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण और जिम्मेदार विकास के लिए एक सुव्यवस्थित मंच बनाने पर केंद्रित है।

झारखंड से आरंभ होकर होडोपैथी भारत के अन्य जनजातीय क्षेत्रों से भी सम्मानपूर्ण ज्ञान-संवाद स्थापित करने और धीरे-धीरे राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक-कल्याण मंचों तक पहुँचने की आकांक्षा रखती है।

इस विस्तार में प्रत्येक क्षेत्र के समुदायों, भाषाओं, सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान-अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।

होडोपैथी क्या विकसित करना चाहती है?

उपयुक्त अनुसंधान, सुरक्षा मूल्यांकन और नियामकीय अनुपालन के अधीन होडोपैथी निम्न संभावनाओं पर कार्य कर सकती है:

  • पौधों पर आधारित पोषण अनुपूरक
  • पारंपरिक खाद्य पदार्थों से प्रेरित उत्पाद
  • वानस्पतिक कल्याण उत्पाद
  • दैनिक पोषण और स्फूर्ति में सहयोग
  • स्वस्थ एवं सक्रिय जीवन के लिए पोषण अनुपूरक
  • जिम्मेदारीपूर्वक प्राप्त स्थानीय प्राकृतिक घटक
  • प्राकृतिक कल्याण संबंधी शैक्षणिक सामग्री
  • पारंपरिक ज्ञानधारकों और समुदायों के लिए साझा मंच
  • स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण और खेती के मॉडल
  • अनुसंधान एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम

होडोपैथी के प्रत्येक विकास को एक स्पष्ट सिद्धांत का पालन करना चाहिए:

पारंपरिक प्रेरणा के साथ जिम्मेदार मूल्यांकन और पारदर्शी संचार अनिवार्य है।

होडोपैथी क्या दावा नहीं करती?

होडोपैथी यह दावा नहीं करती कि प्रत्येक पारंपरिक व्यवहार वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है अथवा व्यावसायिक उपयोग के लिए उपयुक्त है।

यह योग्य चिकित्सकीय देखभाल, निर्धारित उपचार या पेशेवर स्वास्थ्य परामर्श का विकल्प बनने का दावा भी नहीं करती। इसका प्राथमिक क्षेत्र प्राकृतिक पोषण, जिम्मेदार अनुपूरण और सामान्य कल्याण है।

किसी गंभीर रोग, स्वास्थ्य समस्या या आपात स्थिति में केवल पारंपरिक जानकारी अथवा प्राकृतिक उत्पादों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। ऐसी परिस्थितियों में योग्य चिकित्सक की सहायता लेना आवश्यक है।

यह स्पष्ट अंतर उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करता है, वास्तविक पारंपरिक ज्ञान का सम्मान बनाए रखता है और होडोपैथी की दीर्घकालीन विश्वसनीयता को मजबूत करता है।

प्राकृतिक अनुपूरक ब्रांड से कहीं अधिक

होडोपैथी की परिकल्पना केवल प्राकृतिक स्वास्थ्य अनुपूरकों की एक श्रृंखला के रूप में नहीं की गई है। इसका उद्देश्य एक ऐसा सहयोगी मंच विकसित करना है जो निम्न समूहों को साथ ला सके:

  • पारंपरिक अभ्यासकर्ता
  • आदिवासी एवं जनजातीय ज्ञानधारक
  • किसान और वन-आश्रित समुदाय
  • वनस्पति और नृवंश-वनस्पति शोधकर्ता
  • पोषण एवं प्राकृतिक-कल्याण विशेषज्ञ
  • विश्वविद्यालय और वैज्ञानिक संस्थान
  • मान्यता प्राप्त गुणवत्ता परीक्षण प्रयोगशालाएँ
  • जिम्मेदार उत्पादक और सामाजिक उद्यम
  • जैव-विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण संगठन
  • विद्यार्थी और युवा शोधकर्ता

इन सभी समूहों को जोड़कर होडोपैथी पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, जिम्मेदार अनुसंधान, जैव-विविधता की रक्षा, समुदाय-केंद्रित आजीविका और विश्वसनीय प्राकृतिक-कल्याण नवाचार को प्रोत्साहित करना चाहती है।

होडोपैथी का भविष्य

प्राकृतिक कल्याण का भविष्य ऐसे संतुलित दृष्टिकोण पर निर्भर है जो पारंपरिक अनुभवों को महत्त्व दे, वैज्ञानिक जिम्मेदारी की अपेक्षा करे, जैव-विविधता की रक्षा करे और समुदायों के अधिकारों का सम्मान करे।

होडोपैथी बिखरे हुए पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण, अध्ययन, शिक्षा और जिम्मेदार विकास के एक सुव्यवस्थित मंच से जोड़ना चाहती है।

इसकी यात्रा सुनने से आरंभ होती है।

यह सहमति और सम्मानपूर्ण प्रलेखन के माध्यम से आगे बढ़ती है।

यह वानस्पतिक पहचान, गुणवत्ता परीक्षण और वैज्ञानिक मूल्यांकन से विश्वसनीय बनती है।

और यह तभी सफल हो सकती है जब ज्ञानधारक, समुदाय, प्रकृति और व्यापक समाज—सभी समान रूप से लाभान्वित हों।

होडोपैथी — जहाँ आदिवासी ज्ञान जिम्मेदार आधुनिक अनुसंधान से मिलता है।