होडोपैथी अनुसंधान: पारंपरिक ज्ञान से वैज्ञानिक प्रमाण तक
झारखंड के जंगल जैव-विविधता और पीढ़ियों से संचित पारंपरिक वनस्पति ज्ञान के महत्त्वपूर्ण भंडार हैं। आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों ने दीर्घकालीन अवलोकन और जीवन-अनुभव के माध्यम से पौधों, पत्तियों, जड़ों, छाल, बीजों और विभिन्न वन-संसाधनों के विषय में गहरी समझ विकसित की है।
इस ज्ञान का बड़ा भाग आज भी मौखिक परंपराओं के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँच रहा है। बदलती जीवन-शैली, प्राकृतिक आवासों पर बढ़ता दबाव और व्यवस्थित प्रलेखन की कमी के कारण इस बहुमूल्य विरासत के धीरे-धीरे लुप्त होने का खतरा है।
श्री राजीव सिंह द्वारा परिकल्पित होडोपैथी अनुसंधान पहल का उद्देश्य इस ज्ञान के संरक्षक समुदायों की पूर्व-सूचित भागीदारी के साथ इसे सुरक्षित करना और जिम्मेदार वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ना है।
होडोपैथी अनुसंधान क्या है?
होडोपैथी एक प्रस्तावित अनुसंधान-केंद्रित पहल है, जिसका उद्देश्य झारखंड के आदिवासी एवं स्थानीय समुदायों के पारंपरिक वनस्पति ज्ञान का प्रलेखन और वैज्ञानिक अध्ययन करना है।
इसका उद्देश्य पारंपरिक दावों को बिना परीक्षण के स्वीकार करना नहीं है। होडोपैथी सामुदायिक अनुभवों और अवलोकनों को स्पष्ट अनुसंधान प्रश्नों में परिवर्तित कर उनका व्यवस्थित वानस्पतिक पहचान, गुणवत्ता मूल्यांकन, सुरक्षा परीक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन के माध्यम से परीक्षण करना चाहती है।
होडोपैथी पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को परस्पर पूरक मानती है। पारंपरिक ज्ञान शोधकर्ताओं को उपयोगी पौधों और प्रासंगिक परंपराओं की दिशा दिखा सकता है, जबकि विज्ञान उनकी पहचान, संरचना, सुरक्षा, सीमाओं और संभावित उपयोगों का निष्पक्ष मूल्यांकन करने में सहायता कर सकता है।
अनुसंधान के उद्देश्य
होडोपैथी अनुसंधान के प्रमुख उद्देश्य हैं:
- झारखंड के पारंपरिक वनस्पति ज्ञान का नैतिक प्रलेखन
- पौधों के स्थानीय नाम, उपयोग किए जाने वाले भाग और पारंपरिक तैयारी-विधियों का अभिलेखीकरण
- पौधों की सटीक वानस्पतिक पहचान स्थापित करना
- सुरक्षित हर्बेरियम और डिजिटल ज्ञान-संग्रह विकसित करना
- चयनित वनस्पति सामग्रियों की गुणवत्ता, शुद्धता और सुरक्षा का अध्ययन
- स्थानीय वनस्पतियों के संरक्षण और टिकाऊ खेती को प्रोत्साहन
- पारंपरिक ज्ञानधारकों के अधिकारों और योगदान की रक्षा
- स्थानीय समुदायों के लिए अनुसंधान, प्रशिक्षण और आजीविका के अवसर विकसित करना
- समुदायों, विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना
जिम्मेदार प्रलेखन, वानस्पतिक अनुसंधान और वैज्ञानिक मूल्यांकन के माध्यम से पारंपरिक वनस्पति ज्ञान के संरक्षण हेतु झारखंड के जनजातीय समुदायों के साथ कार्य करते श्री राजीव सिंह।
समुदाय से आरंभ होने वाला अनुसंधान
होडोपैथी अनुसंधान का आरंभ केवल प्रयोगशाला से नहीं, बल्कि समुदायों के बीच से होना चाहिए। किसी भी सामुदायिक ज्ञान का प्रलेखन करने से पहले संबंधित ज्ञानधारकों और समुदायों की पूर्व-सूचित सहमति प्राप्त करना आवश्यक है।
प्रलेखित की जाने वाली जानकारी में पौधे का स्थानीय नाम, प्राकृतिक आवास, संग्रह का मौसम, उपयोग किया जाने वाला भाग, पारंपरिक तैयारी-विधि, भंडारण प्रक्रिया और ज्ञात सावधानियाँ सम्मिलित हो सकती हैं। जिस सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक संदर्भ में इस ज्ञान का उपयोग किया जाता रहा है, उसका भी सावधानीपूर्वक अभिलेखीकरण किया जाना चाहिए।
पारंपरिक ज्ञानधारकों को केवल सूचना के स्रोत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्हें ज्ञान-सहयोगी के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए और जहाँ उपयुक्त हो, उन्हें सामुदायिक शोधकर्ता एवं योगदानकर्ता के रूप में पूरी अनुसंधान प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाना चाहिए।
संवेदनशील अथवा किसी विशेष समुदाय से संबंधित जानकारी को अनुमति के बिना सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए और न ही उसका व्यावसायिक उपयोग होना चाहिए।
वानस्पतिक सर्वेक्षण और पौधों की पहचान
एक ही स्थानीय नाम अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न पौधों के लिए प्रयुक्त हो सकता है। इसी प्रकार देखने में समान लगने वाली दो प्रजातियों के गुण और सुरक्षा-मानक पूरी तरह अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी भी वैज्ञानिक अनुसंधान की पहली आवश्यकता पौधे की सटीक वानस्पतिक पहचान है।
प्रस्तावित अनुसंधान प्रक्रिया में निम्न गतिविधियाँ सम्मिलित हो सकती हैं:
- पौधे के प्राकृतिक आवास में क्षेत्रीय सर्वेक्षण
- स्थानीय और वानस्पतिक नामों का अभिलेखीकरण
- पौधे की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का छायांकन
- पत्तियों, फूलों, फलों, बीजों, छाल और जड़ों का अध्ययन
- स्थान, ऋतु और पर्यावरणीय परिस्थितियों का प्रलेखन
- प्रमाणित संदर्भ नमूनों का संरक्षण
- योग्य वनस्पति वैज्ञानिकों द्वारा सत्यापन
- आवश्यकता पड़ने पर उन्नत पहचान तकनीकों का उपयोग
किसी पौधे की पहचान विश्वसनीय रूप से स्थापित होने के बाद ही उसे आगे के वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए चुना जाना चाहिए।
हर्बेरियम और डिजिटल ज्ञानकोष
होडोपैथी झारखंड में पाए जाने वाले चयनित पौधों के लिए एक सुव्यवस्थित हर्बेरियम और सुरक्षित डिजिटल ज्ञानकोष विकसित करने का प्रस्ताव रखती है।
हर्बेरियम में प्रमाणित वनस्पति नमूनों के साथ उनका वानस्पतिक नाम, स्थानीय नाम, संग्रह-स्थल, संग्रह का मौसम, प्राकृतिक आवास और विशिष्ट पहचान संबंधी विशेषताएँ सुरक्षित रखी जा सकती हैं।
डिजिटल ज्ञानकोष में पौधों के छायाचित्र, क्षेत्रीय अवलोकन, सामुदायिक विवरण, प्रयोगशाला रिपोर्ट और अनुसंधान निष्कर्ष सम्मिलित किए जा सकते हैं। संवेदनशील जानकारी तक पहुँच नियंत्रित होनी चाहिए तथा इसके प्रबंधन में समुदाय की सहमति और बौद्धिक अधिकारों को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाना चाहिए।
यह ज्ञान-संग्रह पारंपरिक ज्ञान को लुप्त होने या गलत पहचान से बचाते हुए भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए एक विश्वसनीय संदर्भ बन सकता है।
गुणवत्ता नियंत्रण और मानकीकरण
प्राकृतिक वनस्पति सामग्रियों की संरचना और गुणवत्ता मिट्टी, जलवायु, ऋतु, परिपक्वता, संग्रहण प्रक्रिया, सुखाने की विधि और भंडारण परिस्थितियों के अनुसार बदल सकती है। इसलिए सार्थक एवं विश्वसनीय अनुसंधान के लिए मानकीकरण आवश्यक है।
होडोपैथी अनुसंधान में निम्न विषयों का अध्ययन किया जा सकता है:
- पौधे की सही प्रजाति और उपयुक्त भाग
- संग्रहण का उचित मौसम और परिपक्वता
- सफाई और प्राथमिक प्रसंस्करण की विधियाँ
- नियंत्रित परिस्थितियों में सुखाने की प्रक्रिया
- नमी की मात्रा
- बाहरी पदार्थों और संदूषण की जाँच
- बैच की पहचान और स्रोत तक पता लगाने की व्यवस्था
- भंडारण स्थिरता
- पैकेजिंग और उपयोग-अवधि
स्वच्छ कार्यस्थल, सौर अथवा नियंत्रित सुखाने की प्रणालियाँ, डिजिटल तौल उपकरण और सुरक्षित भंडारण सुविधाएँ गुणवत्ता में एकरूपता तथा प्रक्रिया की पता लगाने योग्य व्यवस्था को बेहतर बना सकती हैं।
पारंपरिक विरासत का संरक्षण: झारखंड के छोटानागपुर पठार में पाई जाने वाली दुर्लभ नृवंश-औषधीय वनस्पतियों का प्रलेखन करते श्री राजीव सिंह।
सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
कोई पदार्थ केवल प्राकृतिक होने के कारण स्वतः सुरक्षित नहीं हो जाता। पौधे की गलत पहचान, अनुपयुक्त मात्रा, संदूषण अथवा दवाओं के साथ उसकी परस्पर क्रिया स्वास्थ्य संबंधी जोखिम उत्पन्न कर सकती है।
इसलिए किसी पौधे या वनस्पति सामग्री की उपयोगिता अथवा प्रभावशीलता के विषय में दावा करने से पहले उसकी सुरक्षा का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है। प्रस्तावित परीक्षणों में निम्न शामिल हो सकते हैं:
- सूक्ष्मजीवी संदूषण की जाँच
- भारी धातुओं और हानिकारक अवशेषों की जाँच
- संबंधित रासायनिक घटकों का प्रारंभिक विश्लेषण
- विषाक्तता और सुरक्षा का मूल्यांकन
- उपयुक्त मात्रा और उपयोग-विधियों का अध्ययन
- दवाओं के साथ संभावित परस्पर क्रियाओं का आकलन
- स्थिरता और उपयोग-अवधि का परीक्षण
- उपयुक्त वैज्ञानिक एवं नियामकीय विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा
पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण, गुणवत्ता नियंत्रण और लागू नियामकीय स्वीकृति के बिना किसी भी अनुसंधान नमूने को उपचार अथवा व्यावसायिक स्वास्थ्य उत्पाद के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए।
पारंपरिक तैयारी-विधियों का अध्ययन
पारंपरिक वनस्पति तैयारियाँ केवल विभिन्न सामग्रियों को मिलाने तक सीमित नहीं होतीं। पौधे का प्रयुक्त भाग, सामग्री का अनुपात, तापमान, पीसने या गर्म करने की अवधि, पानी की गुणवत्ता और भंडारण की विधि अंतिम तैयारी को प्रभावित कर सकती है।
होडोपैथी अनुसंधान इन प्रक्रियाओं का सम्मानपूर्वक प्रलेखन करने और उसके बाद नियंत्रित परिस्थितियों में उनका वैज्ञानिक अध्ययन करने का प्रस्ताव रखता है। शोधकर्ता यह जाँच कर सकते हैं कि किसी पारंपरिक तैयारी को एक समान गुणवत्ता के साथ दोबारा तैयार किया जा सकता है या नहीं, प्रक्रिया के कौन-से चरण महत्त्वपूर्ण हैं तथा मूल ज्ञान-संदर्भ को मिटाए बिना स्वच्छता, माप और स्रोत-पहचान को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य सामुदायिक परंपराओं और वैज्ञानिक मूल्यांकन के बीच जिम्मेदार सेतु स्थापित करना है।
सामुदायिक वनौषधि अनुसंधान एवं प्रसंस्करण केंद्र
होडोपैथी झारखंड में स्वच्छ और सुव्यवस्थित सामुदायिक वनौषधि अनुसंधान एवं प्राथमिक प्रसंस्करण केंद्र स्थापित करने की परिकल्पना करती है। इन केंद्रों में पारंपरिक ज्ञानधारक, प्रशिक्षित स्थानीय सदस्य और शोधकर्ता एक साझा कार्यस्थल पर मिलकर कार्य कर सकते हैं।
प्रस्तावित सुविधाओं में शामिल हो सकते हैं:
- वानस्पतिक पहचान और संदर्भ क्षेत्र
- पौध सामग्री धोने एवं छाँटने की व्यवस्था
- नियंत्रित अथवा सौर-सहायित सुखाने की प्रणालियाँ
- पीसने, छानने और तौलने के उपकरण
- अनुसंधान नमूने तैयार करने के क्षेत्र
- प्राथमिक गुणवत्ता परीक्षण की सुविधाएँ
- हर्बेरियम और डिजिटल प्रलेखन प्रणाली
- स्वच्छ भंडारण और बैच अभिलेखीकरण व्यवस्था
- प्रशिक्षण एवं सामुदायिक परामर्श स्थल
ऐसे केंद्र पौधों की पहचान, संरक्षण, खेती, प्राथमिक प्रसंस्करण, प्रलेखन और गुणवत्ता प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।
सामुदायिक अधिकार और लाभ-साझाकरण
पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने वाले समुदायों के अधिकारों की रक्षा किए बिना उसका अनुसंधान अथवा व्यावसायिक उपयोग जिम्मेदारीपूर्वक नहीं किया जा सकता।
होडोपैथी पूर्व-सूचित सहमति, पारदर्शिता, उचित श्रेय और न्यायसंगत लाभ-साझाकरण के सिद्धांतों का पालन करने का प्रस्ताव रखती है। ज्ञानधारकों को उचित पहचान, प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर, अनुसंधान में भागीदारी तथा स्वीकृत व्यावसायिक उपयोगों से उत्पन्न भविष्य के लाभों में न्यायसंगत हिस्सा मिलना चाहिए।
गोपनीय ज्ञान को अनधिकृत प्रकटीकरण अथवा शोषण से सुरक्षित रखा जाना चाहिए। प्रलेखन और अनुसंधान से लेकर संभावित उत्पाद-विकास तक प्रत्येक चरण में सामुदायिक अधिकार केंद्रीय स्थान पर होने चाहिए।
संस्थागत सहयोग
होडोपैथी अनुसंधान के लिए निम्न हितधारकों के बीच बहुविषयक सहयोग आवश्यक होगा:
- आदिवासी एवं स्थानीय ज्ञानधारक
- वनस्पति और कृषि वैज्ञानिक
- फार्माकोग्नोसी एवं प्राकृतिक उत्पादों के शोधकर्ता
- रसायन विज्ञान और सूक्ष्मजीव विज्ञान विशेषज्ञ
- विश्वविद्यालय और मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाएँ
- जनजातीय एवं सामुदायिक संगठन
- जैव-विविधता और प्रकृति-संरक्षण विशेषज्ञ
- जिम्मेदार सार्वजनिक एवं निजी संस्थान
श्री राजीव सिंह की परिकल्पना के अंतर्गत SIART वानस्पतिक प्रलेखन, क्षेत्रीय अध्ययन, परीक्षण, प्रशिक्षण, सामुदायिक क्षमता-विकास और अनुसंधान परियोजनाओं के लिए उपयुक्त संस्थागत सहयोग स्थापित करने में भूमिका निभा सकता है।
संभावित अनुसंधान परिणाम
समय के साथ होडोपैथी अनुसंधान पहल निम्न परिणामों की दिशा में कार्य कर सकती है:
- झारखंड के चयनित पौधों का प्रमाणित डेटाबेस
- सुरक्षित डिजिटल ज्ञान-संग्रह
- वैज्ञानिक रूप से व्यवस्थित हर्बेरियम
- पारंपरिक तैयारी-विधियों का क्रमबद्ध प्रलेखन
- चयनित वनस्पति सामग्रियों पर गुणवत्ता और सुरक्षा अनुसंधान
- संरक्षण और टिकाऊ खेती के मॉडल
- स्थानीय महिलाओं और युवाओं के लिए प्रशिक्षण के अवसर
- समुदाय-आधारित ग्रामीण उद्यम
- शोधकर्ताओं और पारंपरिक ज्ञानधारकों के बीच सुदृढ़ सहयोग
होडोपैथी अनुसंधान की सफलता का मूल्यांकन केवल विकसित उत्पादों की संख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। इसे संरक्षित ज्ञान, प्राप्त वैज्ञानिक विश्वसनीयता, सुरक्षित जैव-विविधता और समुदायों को मिले वास्तविक लाभों के आधार पर भी मापा जाना चाहिए।
राजीव सिंह की अनुसंधान दृष्टि
श्री राजीव सिंह के अनुसार:
“होडोपैथी का उद्देश्य परंपराओं को बिना परीक्षण स्वीकार करना अथवा उन्हें आधुनिक विज्ञान के विरुद्ध खड़ा करना नहीं है। हमारा लक्ष्य पारंपरिक ज्ञान को गरिमा के साथ संरक्षित करना, जिम्मेदार वैज्ञानिक पद्धतियों से उसका अध्ययन करना और समुदायों को इस पूरी यात्रा का वास्तविक सहभागी बनाना है।”
होडोपैथी ऐसे भविष्य के निर्माण का प्रयास करती है जिसमें पारंपरिक ज्ञान को उचित पहचान मिले, अनुसंधान वैज्ञानिक अनुशासन के साथ आगे बढ़े, जैव-विविधता सुरक्षित रहे और समुदायों को न्यायसंगत भागीदारी प्राप्त हो।
अनुसंधान सहयोग के लिए आमंत्रण
विश्वविद्यालयों, वनस्पति विशेषज्ञों, प्रयोगशालाओं, जनजातीय संगठनों, संरक्षण संस्थानों और जिम्मेदार उद्यमों को होडोपैथी पहल के साथ अनुसंधान एवं ज्ञान-साझेदारी की संभावनाएँ तलाशने के लिए आमंत्रित किया जाता है।
सहयोग के संभावित क्षेत्रों में वानस्पतिक सर्वेक्षण, पौधों का प्रमाणीकरण, हर्बेरियम विकास, गुणवत्ता परीक्षण, सुरक्षा मूल्यांकन, टिकाऊ खेती, डिजिटल प्रलेखन और सामुदायिक प्रशिक्षण सम्मिलित हैं।
होडोपैथी अनुसंधान: स्वदेशी ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम
झारखंड के जंगल असाधारण जैव-विविधता और पीढ़ियों से संचित पारंपरिक वनस्पति ज्ञान को अपने भीतर सँजोए हुए हैं। आदिवासी समुदायों ने लंबे अवलोकन और अनुभव के माध्यम से स्थानीय पौधों, जड़ों, पत्तियों, छाल और बीजों के विषय में बहुमूल्य समझ विकसित की है। इस ज्ञान का बड़ा भाग आज भी अप्रलेखित है और समय के साथ इसके लुप्त होने का खतरा है।
श्री राजीव सिंह द्वारा परिकल्पित होडोपैथी अनुसंधान पहल का उद्देश्य इस प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित कर जिम्मेदार वैज्ञानिक अनुसंधान से जोड़ना है।
हमारी अनुसंधान पद्धति
होडोपैथी पारंपरिक दावों को बिना परीक्षण स्वीकार नहीं करती। इसका उद्देश्य सामुदायिक ज्ञान का सम्मानपूर्वक प्रलेखन करना और चयनित पौधों का एक सुव्यवस्थित अनुसंधान प्रक्रिया के माध्यम से अध्ययन करना है। इस प्रक्रिया में निम्न गतिविधियाँ सम्मिलित हो सकती हैं:
- क्षेत्रीय सर्वेक्षण और वानस्पतिक पहचान
- समुदाय की भागीदारी से ज्ञान का प्रलेखन
- हर्बेरियम और डिजिटल डेटाबेस का विकास
- गुणवत्ता, शुद्धता और संदूषण परीक्षण
- सुरक्षा और स्थिरता का मूल्यांकन
- संग्रहण एवं प्रसंस्करण विधियों का मानकीकरण
- पौधों का संरक्षण और टिकाऊ खेती
किसी पौधे का प्राकृतिक होना उसे स्वतः सुरक्षित या प्रभावी सिद्ध नहीं करता। स्वास्थ्य संबंधी किसी भी उपयोग पर विचार करने से पहले उसकी सही पहचान, उपयुक्त मात्रा, संभावित दुष्प्रभाव और दवाओं के साथ परस्पर क्रिया का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक है।
सामुदायिक साझेदारी, वानस्पतिक प्रलेखन और जिम्मेदार वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से झारखंड की स्वदेशी वनस्पति जीवन-बुद्धि का संरक्षण।
समुदाय-आधारित अनुसंधान
पारंपरिक ज्ञानधारक केवल सूचना के स्रोत नहीं, बल्कि आवश्यक अनुसंधान सहयोगी हैं। होडोपैथी पूर्व-सूचित सहमति, उचित मान्यता, सामुदायिक ज्ञान की सुरक्षा और न्यायसंगत लाभ-साझाकरण का समर्थन करती है।
यह पहल वनस्पति संरक्षण, खेती, प्राथमिक प्रसंस्करण और प्रलेखन के माध्यम से जनजातीय महिलाओं और युवाओं के लिए प्रशिक्षण, अनुसंधान तथा आजीविका के अवसर विकसित करने का भी प्रयास करती है।
स्वच्छ अनुसंधान और प्रसंस्करण सुविधाएँ
होडोपैथी ऐसे सामुदायिक वनौषधि अनुसंधान एवं प्रसंस्करण केंद्रों की स्थापना का प्रस्ताव रखती है, जहाँ पौधों की पहचान, धुलाई, छँटाई, नियंत्रित सुखाई, पीसने, तौलने, नमूने तैयार करने और बैच प्रलेखन की सुविधाएँ उपलब्ध हों।
ये केंद्र स्थानीय विशेषज्ञता को स्वच्छ आधारभूत संरचना, पता लगाने योग्य प्रक्रियाओं और आधुनिक गुणवत्ता-नियंत्रण पद्धतियों से जोड़ सकते हैं।
सहयोग और भविष्य की दिशा
श्री राजीव सिंह की परिकल्पना के अंतर्गत SIART विश्वविद्यालयों, वनस्पति विशेषज्ञों, मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं, जनजातीय संगठनों और प्रकृति-संरक्षण संस्थानों के साथ सहयोग स्थापित करने में भूमिका निभा सकता है।
इसके संभावित परिणामों में प्रमाणित वनस्पति डेटाबेस, हर्बेरियम, सुरक्षित ज्ञानकोष, वैज्ञानिक अध्ययन, टिकाऊ खेती के मॉडल और समुदाय-आधारित ग्रामीण उद्यम सम्मिलित हो सकते हैं।
“हमारा उद्देश्य पारंपरिक ज्ञान को गरिमा के साथ संरक्षित करना, जिम्मेदार विज्ञान के माध्यम से उसका मूल्यांकन करना और यह सुनिश्चित करना है कि समुदाय इस पूरी यात्रा में सहभागी भी रहें और लाभार्थी भी।”
— राजीव सिंह
