राजीव सिंह की पहल पर पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण, औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण को मिला डिजिटल विस्तार
गिरिडीह, 8 अक्टूबर 2026। आदिवासी समुदायों के सदियों पुराने ज्ञान को सहेजने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के उद्देश्य से होड़ोपैथी की तीन वेबसाइटों—Hodopathy.org, Hodopathy.in और Hodopathy.com—का लोकार्पण किया गया। पर्यावरणविद् राजीव सिंह के गिरिडीह स्थित आवासीय कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में पारंपरिक वैद्य, आदिवासी समाज के प्रतिनिधि, युवा और अभियान से जुड़े सहयोगी उपस्थित रहे।
इस पहल का उद्देश्य बुजुर्गों और पारंपरिक ज्ञानधारकों के अनुभवों का सम्मानपूर्वक दस्तावेजीकरण करना, औषधीय वनस्पतियों के संरक्षण को बढ़ावा देना तथा सीखने और शोध के अवसर विकसित करना है। गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क को भी अभियान से जोड़ा गया है।
पुरखों के अनुभवों को सहेजने का संकल्प
आदिवासी समुदायों का जंगलों और वनस्पतियों से गहरा संबंध रहा है। पौधों की पहचान, उनके पारंपरिक उपयोग और स्थानीय पर्यावरण से जुड़ी जानकारी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है। इस विरासत का बड़ा हिस्सा आज भी मौखिक परंपरा में सुरक्षित है। अभियान के माध्यम से इसे ज्ञानधारकों की सहभागिता और सहमति से संकलित करने की योजना है।
राजीव सिंह का प्रस्तावित संदेश:
“हमारे आदिवासी बुजुर्गों के पास प्रकृति के साथ जीवन बिताकर अर्जित किया गया अनमोल ज्ञान है। हमारा संकल्प है कि उनके अनुभव, उनकी पहचान और उनके योगदान को सम्मान के साथ सहेजा जाए। होड़ोपैथी की इस पहल के माध्यम से हम नई पीढ़ी को अपनी ज्ञान-विरासत से जोड़ना चाहते हैं और उन पौधों व जंगलों के संरक्षण को आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिनसे यह विरासत जुड़ी है।”
डिजिटल संग्रह, पुस्तक और युवाओं का प्रशिक्षण
अभियान के पहले चरण में पारंपरिक वैद्यों और स्थानीय जानकारों के सहयोग से अनुभवों, वनस्पतियों की पहचान और उनके पारंपरिक उपयोगों का डिजिटल संग्रह तैयार किया जाएगा। दूसरे चरण में वरिष्ठ वैद्यों के अनुभवों तथा औषधीय पौधों पर पुस्तक प्रकाशन की योजना है।
इसके बाद युवाओं को पौधों की पहचान, संरक्षण और दस्तावेजीकरण का प्रशिक्षण देकर अभियान से जोड़ा जाएगा। संकलित जानकारी का उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य से मिलान करने तथा शोध संस्थानों के सहयोग से पारंपरिक उपयोगों की प्रभावशीलता और सुरक्षा के अध्ययन का प्रयास भी होगा।
रिमी सिंह का प्रस्तावित संदेश:
“बुजुर्गों का अनुभव आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मूल्यवान धरोहर है। जब परिवार और समुदाय मिलकर इस ज्ञान को सहेजेंगे, तभी इसका सिलसिला आगे बढ़ेगा। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी इस पहल को घर-घर तक पहुंचाने और औषधीय पौधों के संरक्षण को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।”
औषधीय पौधों और जंगलों के संरक्षण पर जोर
होड़ोपैथी से जुड़े ज्ञान को सुरक्षित रखने के साथ उसके प्राकृतिक आधार को बचाना भी अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। स्थानीय औषधीय प्रजातियों के पौधरोपण और संवर्धन के माध्यम से वनस्पति संरक्षण तथा जैव विविधता के प्रति जागरूकता बढ़ाने की योजना है।
गांडेय स्थित होड़ोपैथी पार्क से जुड़े कार्य को आगे बढ़ाते हुए लोगों को स्थानीय पौधों की पहचान और उनके संरक्षण के महत्व से परिचित कराने का प्रयास किया जाएगा।
आंचल सिंह का प्रस्तावित संदेश:
“हम युवाओं के लिए यह अपने बुजुर्गों से सीखने और अपनी जड़ों को समझने का अवसर है। डिजिटल माध्यम इस ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। हम पौधों की पहचान सीखकर, उनके संरक्षण में भाग लेकर और बुजुर्गों के अनुभवों को उनकी सहमति से दर्ज करके इस पहल में योगदान दे सकते हैं।”
सहमति, सम्मान और सहभागिता के साथ आगे बढ़ेगा अभियान
दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया में पारंपरिक ज्ञानधारकों की सहमति, अधिकारों और योगदान के सम्मान को प्राथमिकता दी जाएगी। अभियान में अनुभवी वैद्यों, बुजुर्गों, विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और सामाजिक संस्थाओं की सहभागिता का आह्वान किया गया है।
कार्यक्रम में सीए राकेश, रिमी सिंह, समन, शुभम, सोनाली, आंचल सिंह, आनंद मुर्मू, विनीता टुडू और मनोज हेंब्रम सहित पारंपरिक वैद्य एवं आदिवासी समाज के प्रतिनिधि उपस्थित थे।
